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तरुणी गांधी

इस वाकये ने मुझे सोच में डाल दिया।42 सेक्टर की लेक पर बेटे को टहलाने के लिए ले गई थी। पतिदेव भी साथ में थे। इधर उधर की बातें कि बच्चे के साथ खेलते खेलते नजर कुछ लडकियों पर पडी। अपनी मस्ती में घूम रही थीं और उसी मस्ती में डूबी हुई गंदगी फैला रहीं थीं। मौतरमाओं ने भेलपूरी ली, कागज वहीं फेंक दिए। भेलपूरी बेचने वाले लड़के ने थोड़ी देर में गर्दन गुस्से में घूमाते हुए कागज को उठाया और डस्टबिन में डाल दिया। 

इस बात पर अभी तक मेरा ध्यान इतना नहीं गया था जब तक मैंने खुद भेलपूरी  नहीं खरीदी। दो भेलपूरी ली और लेते ही लड़के ने मुझ से कहा दीदी, खाकर कागज को डस्टबिन में गिरा देना। मैं चुपचाप उसकी बात सुनी और तंज मारते हुए मैंने कहा अच्छा भाई अाप न बताते तो डस्टबिन में मैं ना गिराती। लड़का बोला दीदी बुरा न मानो मैं रोज आपके जैसे कई पढ़े लिखों को बोलता हूं और रोज उनके फैंके कागज, कचरे को उठा कर डस्टबिन में डालता हूं। मैं मुस्कुरा दी और वो बड़बडाता हुआ आगे चला गया इनसे तो हम अनपढ़ ही अच्छे, जहां घूमते हैं उसे साफ तो रखते हैं। 
 

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Comments

  1. L R Gandhi
    February 7, 2016 at 11:58 am

    kutta bhi jahan baithta hai poonch se sthaan saaf karta hai …. shwaan se seekho

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