Reading Time: 2 minutes

संथारा है

जब से तेरी ऊँगली पकड़ कर चलने की ठानी है

जिंदगी यकायक ‘जो है सो है ‘ की माफिक कटी पतंग सी हुई जा रही है

बिना डोर के आकाश की नित नई उचाइयां छूने को बेताब बेपरवाह !

images (1)

 

 हवा का झोंका जिस ओर लेजाए
वक्त के साथ ही ‘बस’ ऊपरी हवा में परवाज़ पर हो लिए हैं

भय मुक्त, शोक मुक्त, लालसा मुक्त, मुक्ति की बंदिशों से भी मुक्त
कहूँ तो मुक्ति से भी मुक्त

images (3)

अंत: करण में अनंत अमृत कलश लबालब भर कर छलक रहा है

सूखे झरने की  मानिंद बूँद बूँद धीरे धीरे अग्रसर है
अपनी ऊँगली को थामे हाथ में लुप्त हो जाने को 

मृत्यु की ऊँगली पकड़ कर चलना सीखो

 संथारा  है।

 

आपको बता दें कि मौत के लिए व्रत, संथारा  है। संथारा प्रथा जैन समाज की बहुत पुरानी प्रथा है। इस प्रथा के मुताबिक जैन समाज में जब व्यक्ति को लगता है कि वह मौत के करीब है तो खुद को कमरे में बंद कर खाना-पीना त्याग देता है। इसे जैन शास्त्रों में संथारा कहा जाता है। संथारा को जीवन की अंतिम साधना भी माना जाता है, जिसके आधार पर व्यक्ति मृत्यु को पास देखकर सबकुछ त्याग देता है

(एल आर गांधी)

Recommend to friends
  • gplus
  • pinterest

About the Author

Leave a comment