सस्ते मकान की एक पंजाबी कहानी, 2008-2016
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तरुणी गांधी, चंडीगढ़

सस्ते मकान की एक पंजाबी कहानी, 2008-2016, सबकुछ कहानी जैसा ही लगता है। 8 साल पहले की बात है, जब पहली बार पंजाब में सस्ते मकान की कहानी चर्चा में आई थी। इन 8 सालों में केवल हाउसिंग फॉर इकॉनोमिकली व फाइनेंशियल वीकर सैक्शन या अफोर्डेबल हाउस जैसी परिभाषाएं बदली लेकिन ‘मकान नहीं बनने” की जमीनी हकीकत में कोई बदलाव नहीं आया।

अब 2016 में एक बार फिर पंजाब सरकार नई स्कीम ‘अफोर्डेबल हाउसिंग स्कीम-2016″ लेकर आई है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि हकीकत में बदलाव आएगा लेकिन कितना? यह वक्त ही बताएगा। वैसे तो 1995 में घोषित पंजाब अपार्टमेंट एंड प्रॉपर्टी रैग्यूलेशन एक्ट में 40 हैक्टेयर या इससे ज्यादा एरिया में प्रस्तावित कॉलोनी में पहले से ही 10 फीसदी हिस्सा आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग के लिए आरक्षित था लेकिन 7 नवंबर 2008 में सरकार ने इसमें संशोधन करते हुए नई नोटिफिकेशन जारी कर सस्ते मकान का बड़ा सपना दिखाया।

इस नोटिफिकेशन के तहत सरकार ने मैगा व सुपरमैगा हाउसिंग प्रोजैक्ट्स के कुल एरिया में 5 फीसदी हिस्से पर सस्ते मकान बनाने के निर्देश दिए थे। 2011 में भी आदेश जारी कर सरकार ने सस्ते मकान निर्माण को तव्वजो देनी की बात कही लेकिन 2013 तक आते-आते सरकार ने प्रोमोटर/क्लोनाइजर पर सस्ते मकान निर्माण का दबाव बनाने की बजाए उलटा 31 दिसंबर 2013 को हाउसिंग पॉलिसी में ही संशोधन कर दिया। इसमें कहा गया कि जो भी एरिया आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग के लिए आरक्षित रखा गया है, वह एरिया गमाडा सहित अन्य अथॉरिटीज को मुफ्त में ट्रांसफर कर दिया जाए ताकि अथॉरिटीज खुद ही इस क्षेत्र में मकान बनाने की पहल कर सके। इसपर सवाल भी उठे। बाकायदा गमाडा की ऑडिट एंड इंस्पैक्शन रिपोर्ट में कहा गया है कि सस्ते मकान उपलब्ध करवाना प्रोमोटर/क्लोनाइजर्स का दायित्व है, जिसे अथॉरिटीज खुद अपने कंधों पर नहीं ले सकती हैं। ऑडिट एंड इंस्पैक्शन टीम ने इसपर जवाब-तलब भी किया लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात।

2014 में सरकार ने एक बार फिर यू-टर्न लिया। एक बार फिर आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग के लिए मकान का ख्वाब दिखाते हुए सरकार ने पंजाब अपार्टमेंट एंड प्रॉपर्टी रैग्यूलेशन (अमेंडमेंट) एक्ट, 2014 को पेश किया। इसमें रिहायशी अपार्टमेंट के मामले में कुल अपार्टमेंट्स का 10 फीसदी हिस्सा जबकि कॉलोनी के मामले में प्रोजैक्ट के कुल हिस्से का 5 फीसदी हिस्सा आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग के लिए आरक्षित रखने को कहा गया लेकिन इस आरक्षित क्षेत्र में प्रोमोटर/क्लोनाइजर मकान कब बनाएंगे या आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग को मकान कितने समय में उपलब्ध करवाया जाएगा, इसका कोई जिक्र नहीं किया गया है।

नतीजा, हालात जस के तस रहे। हालांकि उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने बड़ा दावा करते हुए कहा कि 2016 तक सरकार एक लाख गरीब परिवारों को सस्ते मकान हर हाल में उपलब्ध करवा देगी। 2015 के अंत तक आते-आते सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा ‘हाउसिंग फॉर ऑल-2022″ मिशन के सुर में सुर मिला लिया। बाकायदा 22 दिसंबर 2015 ‘हाउसिंग फॉर ऑल फॉर द स्टेट ऑफ पंजाब” नाम से पॉलिसी की घोषणा भी कर दी गई। इसमें स्लम डवलपमेंट, स्लम रेहैब्लीटेशन, अफोर्डेबल हाउसिंग थ्रू क्रेडिट लिंकड सब्सिडी, अफोर्डेबल हाउसिंग इन पार्टनरशिप, सब्सिडी फॉर इनविजुअल हाउस कंस्ट्रक्शन जैसी सुविधाएं देने का ऐलान तो किया गया लेकिन इसी के साथ 7 नवंबर 2011 की घोषणा को स्वाह कर दिया। सरकार ने कहा कि 2015 की यह नई पॉलिसी 2011 की घोषणा को खारिज करते हुए नया स्थान लेगी यानी 2011 के आदेश को सुपरसीड कर दिया गया।

अब 2015 में केंद्र सरकार के साथ सुर मिलने के कारण हाउसिंग फॉर ऑल का पूरा मामला तो केंद्र सरकार पर टिका है लेकिन यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती है। 2016 में सरकार एक बार फिर अपने स्तर पर सस्ते मकान की कहानी बुनी है। इस कहानी को नाम दिया गया है ‘अफोर्डेबल हाउसिंग स्कीम-2016″

2008 का सच 2016 में तक बरकरार

जिस तरह 2008 से 2016 तक जरूरतमंद परिवारों को सस्ते मकान नहीं मिल पाए, उसी तरह इस कहानी में एक और पहलू जस का तस कायम है। यह है बिल्डर्स को मुनाफा। 2016 की पॉलिसी पर भी विशेषज्ञ यही सवाल उठा रहे हैं। विशेषज्ञों की मानें तो सरकार ने इस पॉलिसी में न केवल ग्रुप हाउसिंग प्रोजैक्ट संचालकों को सी.एल.यू., ई.डी.सी., एल.एफ/पी.एफ पर महज 50 फीसदी फीस वसूलने की बात कही है बल्कि अफोर्डेबल हाउसिंग के दाम भी बिल्डर्स के स्तर पर तय करने की छूट दी है। इसी कड़ी में जनसंख्या घनत्व में भी बड़ा फेरबदल किया है। स्कीम में 750 वर्ग फीट से 950 वर्ग फीट के अपार्टमेंट निर्माण को लेकर जनसंख्या घनत्व को 750 व्यक्ति प्रति एकड़ कर दिया गया है। इससे पहले भी सरकार ने घोषित मास्टर प्लान्स में बिल्डर्स पर इनायत की थी। फरवरी 2016 में सरकार ने 1200 वर्ग फीट के आवासीय यूनिट को लेकर तय जनसंख्या घनत्व 375 पर्सन प्रति एकड़ को बढ़ाकर 450 पर्सन प्रति एकड़ कर दिया था, जिससे बिल्डर्स को निर्धारित क्षेत्र में अधिक फ्लैट्स बनाने की छूट मिल गई थी।

बिल्डर्स के मुनाफे पर गमाडा की ऑडिट एंड इंस्पैक्शन रिपोर्ट में सवाल उठाए गए थे। रिपोर्ट में कहा गया कि अकेले ग्रेटर मोहाली एरिया डवलपमेंट अथॉरिटी (गमाडा) ने ही 2006 से 2013 तक दर्जनों के हिसाब से बिल्डर्स को आवासीय कॉलोनियों व हाउसिंग प्रोजैक्ट्स के लिए लाइसेंस जारी किए लेकिन एक भी प्रोमोटर/क्लोनाइजर ने आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग के लिए मकानों का निर्माण नहीं किया। और तो और गरीबों के मकान बनाने के संबंध में किसी भी बिल्डर ने अंतिम समयसीमा तक निर्धारित नहीं की। वह भी तब जबकि पंजाब सरकार ने गरीबों के मकान बनाने को प्रोत्साहन देने के लिए प्रोमोटर/क्लोनाइजर्स से वसूली जाने वाली चेंज ऑफ लैंड यूज फीस, एक्सट्रनल डवलपमेंट चार्जेस व लाइसेंस फीस में रियायत भी दी।

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