Reading Time: 3 minutes

– नदी की महिमा का कल्कि पुराण में भी किया गया है वर्णन

एम4पीन्यूज|नेपाल:
मध्य नेपाल में प्रवाहित होने वाली गंडकी नदी को गंडक नदी के नाम से भी जाना जाता है। यह नदी दक्षिण तिब्बत के पहाड़ों से निकलती है और सोनपुर और हाजीपुर के बीच में गंगा नदी में मिलती है। यह नदी काली नदी और त्रिशूली नदियों के संगम से बनी है। इन नदियों के संगम स्थल से भारतीय सीमा तक नदी को नारायणी के नाम से जाना जाता है।
RIVER GANDAKI

RIVER GANDAKI

मान्यता है कि इस नदी के किनारे जिसकी मृत्यु होती है, उसे पूर्वजन्म की याद सदा रहती है। श्री भगवान विष्णु के भावी श्री कल्कि अवतार की महिमा बताने वाले कल्कि पुराण में इस नदी की महिमा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। पुराण के अंतिम खंड में राजा शशिध्वज अपनी प्राणप्रिय पुत्री रमा को भगवान कल्कि को सौंप देते हैं। तब सभी राजा कहते हैं कि, हे राजन! आप अब साक्षात नारायण भगवान कल्कि को अपनी पुत्री ब्याह कर उनके ससुर हो गए हैं। पर परम पुण्य और अन्यान्य सभी उपस्थित जन आपकी भक्ति को ऐसे विस्तृत रूप मे देखकर अत्यंत आश्चर्यचकित हैं। हम आपसे यह विनम्र होकर पूछना चाहते हैं कि परमात्मा की यह पुण्य प्रतापी, मोक्षदायिनी भक्ति आपको किस शुभ कर्म के फल रूप प्राप्त हुई है? राजाओं द्वारा इस प्रकार भगवद् भक्ति के बारे में पूछे जाने पर राजा शशिध्वज ने उन्हें बताया कि, हजारों वर्ष पहले की बात है, मैं मांस का भक्षण करने वाला गिद्ध था तथा मेरी प्रिय पत्नी सुशांता गिद्धनी थी। हम दोनों ही एक विशाल वृक्ष पर घोंसला बनाकर उसमें रहते थे। वन, उपवन, सभी स्थानों पर अपनी इच्छा के अनुरूप विचरण करते थे। मरे हुए प्राणियों का दुर्गंधित मांस खाकर हम अपना जीवन व्यतीत करते थे। एक दिन एक क्रूर व्याध ने हमें देख लिया और हमें पकडऩे के लिए उसने अपने पालतू गिद्ध को हमारे सामने छोड़ दिया। मैं भूख के कारण अत्यंत परेशान था कि मैंने उस गिद्ध को देखा। उसे देखते ही हम मांस भक्षण के उद्देश्य से उस पर झपट पड़े। इस प्रकार हम उस व्याध के जाल में फंस गए।
जब उस  व्याध ने हमें अपने जाल में फंसा देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ और शीघ्रतापूर्वक हमारे पास आया। उसने हम दोनों के कंठ पकड़ लिए। स्वयं को उससे मुक्त करने के लिए हमने उस पर अपनी चोंचों से प्रहार करना आरंभ कर दिया। इससे उस मांस लोभी व्याध ने क्रोध में आकर हम दोनों को गंडकी में स्थित एक शिला पर पटक-पटक कर हमारे मस्तकों का चूरा कर डाला, परंतु एक तो गंडकी नदी का किनारा और चक्रों से अंकित शालिग्राम शिला,जिस पर उसने हमें  पटका था, दोनों के एक साथ वहां होने के कारण हम तत्क्षण ही चतुर्भज रूप हो गए तथा तेजस्वी विमान चढ़कर, सब लोकों के द्वारा पूजा के योग्य बैकुंठ लोक में चले गए। बैकुंठ लोक के पश्चात हमें ब्रह्मलोक की प्राप्ति हुई। तत्पश्चात काल के वशीभूत हम दोनों पति-पत्नी देवलोक में गए। इस प्रकार एक व्याध के द्वारा हम इस स्थिति तक पहुंचे थे। हे राजाओ, उस देवलोक का सुख भोगने के पश्चात हम इस मृत्यु लोक में आए हैं, परंतु शालिग्राम की शिला का वह स्थान और श्री भगवान विष्णु की कृपा अभी तक याद है, क्योंकि गंडकी नदी के तट पर जिसकी मृत्यु होती है, उसे पूर्वजन्म की याद सदा रहती है।
यह अद्भुत महात्म्य  उस नदी के जल के स्पर्श का ही है। यदि उस चक्र के चिन्ह वाली शालिग्राम शिला को छूने मात्र से ही मृत्यु के पश्चात इतना शुभ फल मिलता है तो फिर भगवान वासुदेव की सेवा, भक्ति करने से मिलने वाले फल की तो कोई सीमा ही नहीं है। कलियुग का नाश करने के लिए भगवान नारायण का अवतार होगा, ऐसा हमें ब्रह्माजी के द्वारा पहले ही ज्ञात हो गया था। इस प्रकार भगवान नारायण के पराक्रम को हम भली प्रकार जानते हैं।
शालिग्राम की महिमा आपार
गंडकी अर्थात नारायणी नदी के किनारे शालिग्राम नाम का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। यहां निकलनेवाले पत्थर को शालिग्राम कहते हैं। मान्यता है कि शालिग्राम शिला के स्पर्शमात्र से करोड़ों जन्मों के पाप का नाश हो जाता है। शालिग्राम-शिला की पहचान के लिए उसका परीक्षण जरूरी है, यदि वह काली और चिकनी हो तो उत्तम है। यदि उसकी कालिमा कुछ कम हो तो वह मध्यम श्रेणी की मानी गयी है। और यदि उसमें दूसरे किसी रंग का सम्मिश्रण हो तो वह मिश्रित फल प्रदान करने वाली होती है। जो जन प्रतिदिन द्वारका की शिला-गोमती चक्र से युक्त बारह शालिग्राम मूर्तियों का पूजन करता है, वह वैकुण्ठ लोक में प्रतिष्ठित होता है।

Recommend to friends
  • gplus
  • pinterest

About the Author

Leave a comment