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एक एेसी बाइक जिसकी न सिर्फ पूजा होती है बल्कि उसके नाम का मंदिर भी है

एम4पीन्यूज। ब्यूरो
वाकई चौंकने वाली बात है लेकिन अब तक वैज्ञानिकों के लिए यह बात रहस्य बनी हुई है। क्या वाकई पक्षी आत्महत्या कैसे कर सकते हैं। कुछ लोग इसे भूत-प्रेत और जादू-टोने से जोड़कर देखते हैं। स्थानीय लोग इसे पक्षियों की सामूहिक आत्महत्या की घटना कहते हैं लेकिन कुछ वैज्ञानिकों को इस बात से पूरी तरह इंकार है। चलिये अापको बताते हैं एेसी तमाम जगह जहां अजीबो गरीब वारदातें होती है, जिसकी वजह से वो जगहें मश्हूर हुईं। अभी यहां बात हो रही है असम के जतिंगा गांव की।
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जतिंगा, जहां पक्षी करते हैं आत्महत्या
कम से कम असम के जतिंगा गांव में रहने वाले तो कुछ ऐसा ही मानते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि तेज गति से उड़कर जतिंगा की तरफ आते हुए पक्षी अचानक जमीन पर गिर जाते हैं और गिरते ही दम तोड़ देते हैं। यह आत्महत्या नहीं बल्कि उनकी हत्या से जुड़ा मुद्दा है। मानसून के आखिर में विशेषकर अमावस या कोहरे से भरी शाम में करीब 6.00 से रात 9.30 बजे के बीच अचानक बहुत से पक्षी जतिंगा गांव की रोशनी के चलते रास्ता भटक जाते हैं और स्थानीय लोगों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले बांसों से टकराकर नीचे गिर जाते हैं। पक्षियों के उडऩे की गति बेहद तेज होती है इसलिए जैसे ही वह टकरार जमीन पर गिरते हैं उनकी मौत हो जाती है। प्रकृतिवादी एडवर्ड पिटचर्ड गी ने मौका-मुआयना कर पाया कि अत्याधिक ऊंचाई पर उडऩे वाले पक्षी जब जतिंगा में बह रही तेज हवा में अपनी तेज गति से उतरते हैं तब कोहरे और आसमान में चांद न होने की वजह से वह स्थानीय लोगों द्वारा जलाई गई रोशनी में उलझ जाते हैं और बांसों से टकराकर उनकी मौत हो जाती है। पक्षी प्रेमियों की तरफ से जतिंगा में अशिक्षित लोगों को इस घटना के कारण और उनके बचाव से जुड़ी शिक्षा प्रदान करने के बाद माना जा रहा है कि यहां प्रत्येक वर्ष मरने वाले पक्षियों की संख्या में 40 प्रतिशत तक की कमी आई है।
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कंकाल वाली झील का रहस्य
उत्तराखंड की रूपकुंड झील कुछ दशक पहले अचानक कंकाल झील के नाम से प्रसिद्ध हो गई। झील के किनारों पर 500 से अधिक कंकाल पाए गए। यह कंकाल किसके हैं या झील तक कैसे आए, यह अब तक रहस्य ही बना हुआ है। वैज्ञानिक अब तक महज इतना ही इनकी मौत भूस्खलन या बर्फानी तूफान से हुई थी। वैज्ञानिकों द्वारा इन अवशेषों के अध्ययन में यह भी पाया है कि यह लोग 12वीं सदी से 15वीं सदी तक के बीच के थे।
करीब एक दशक पहले भारतीय और यूरोपीय वैज्ञानिकों के एक दल ने उस स्थान का दौरा किया। इस टीम ने अवशेषों के डी.एन.ए परीक्षण से पाया कि वहां लोगों के कई समूह थे। इनमें छोटे कद के लोगों का एक समूह और लंबे लोगों का एक समूह था। वैज्ञानिकों ने पाया कि यहां मौसम में आए बदलाव के कारण क्रिकेट के गेंद जितनी बड़ी ओलावृष्ठि हुई व कोई सुरिक्षत जगह न मिल पाने के कारण इन सबकी मौत हो गई। बर्फ के कारण यह सभी शरीर सुरिक्षत रहे व बाद में भूस्खलन के साथ कुछ लाशें बहकर झील में चली गईं।
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तैरती झील
मणिपुर में एक झील ऐसी है, जो तैरती है। जी हां, इसे दुनिया के एकमात्र तैरती हुई झील भी कहा जाता है, जहां छोटे-छोटे भूखंड या द्वीप पानी में तैरते हैं। यह मिट्टी, पेड़-पौधों और जैविक पदार्थों से मिलकर बनते है और धरती की तरह ही कठोर होते हैं। इन्होंने झील के काफी बड़े भाग को कवर किया हुआ है। इस झील को देखना वाकई अनोखा अहसास है। तैरती द्वीप का एक बड़ा भाग झील के दक्षिण पूर्व भाग में स्थित है, जो 40 स्क्वायर किलोमीटर तक फैला हुआ है। इस सबसे बड़े भाग में दुनिया के सबसे लंबा और एकमात्र तैरता हुआ पार्क भी है जिसका नाम किबुल लामिआयो नेशनल पार्क है। इस पार्क में दुर्लभ प्रजाति के हिरण भी पाए जाते हैं। इन्हें मणिपुरी भाषा में संगई कहा जाता है।
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चीन की दीवार के बाद दूसरी सबसे बडी दीवार 
राजस्थान के कुम्भलगढ़ दुर्ग के चारों तरफ बनी दीवार चीन की दीवार के बाद दुनिया की सबसे बड़ी दीवार है। इस किले को दुश्मन कभी फतेह नहीं कर पाए। इसीलिए इसे अजेयगढ़ के नाम भी जाना जाता है। इस दुर्ग के भीतर एक और गढ़ है जिसे कटारगढ़ के नाम से जाना जाता है। यह गढ़ सात विशाल द्वारों व सुद्रढ़ प्राचीरों से सुरक्षित है। इस गढ़ के शीर्ष भाग में बादल महल है व कुम्भा महल सबसे ऊपर है। महाराणा प्रताप की जन्म स्थली कुम्भलगढ़ एक तरह से मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी रहा है। महाराणा कुम्भा से लेकर महाराणा राज सिंह के समय तक मेवाड़ पर हुए आक्रमणों के समय राजपरिवार इसी दुर्ग में रहा। यहीं पर पृथ्वीराज और महाराणा सांगा का बचपन बीता था। महाराणा उदय सिंह को भी पन्ना धाय ने इसी दुर्ग में छिपा कर पालन पोषण किया था। हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप भी काफी समय तक इसी दुर्ग में रहे। इस दुर्ग के बनने के बाद ही इस पर आक्रमण शुरू हो गए लेकिन एक बार को छोड़ कर ये दुर्ग प्राय अजेय ही रहा है लेकिन इस दुर्ग की कई दुखांत घटनाये भी है जिस महाराणा कुम्भा को कोई नहीं हरा सका वही परमवीर महाराणा कुम्भा इसी दुर्ग में अपने पुत्र उदय कर्ण द्वारा राज्य लिप्सा में मारे गए। कुल मिलाकर दुर्ग ऐतिहासिक विरासत की शान और शूरवीरों की तीर्थ स्थली रहा है।
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बुलेट मंदिर
राजस्थान में ओम बन्ना पवित्र स्थान है, जहां बुलैट की पूजा की जाती है। दूर-दूर से लोग यहां पर मनोकामनाएं मांगने आते हैं। यह पाली शहर से केवल 20 किमी दूर है।  कहा जाता है कि 1988 में ओम बन्ना अपनी बुलेट पर अपने ससुराल बगड़ी,साण्डेराव से अपने गाँव चोटिला आ रहे थे तभी उनका एक्सीडेंट एक पेड़ से टकराने से हो गया ओम सिंह राठौड़ की उसी वक्त मृत्यु हो गयी एक्सीडेंट के बाद उनकी बुलेट को रोहिट थाने ले जाया गया पर अगले दिन पुलिस कर्मियों को वो बुलेट थाने में नहीं मिली वो बुलेट बिना सवारी चल कर उसी स्थान पर चली गयी अगले दिन फिर उनकी बुलेट को रोहिट थाने ले जाया गया पर फिर वही बात हुयी ऐसा तीन बार हुआ चौथी बार पुलिस ने बुलेट को थाने में चैन से बाँध कर रखा पर बुलेट सबके सामने चालू होकर पुन: अपने मालिक सवार के दुर्घटना स्थल पर पहुंच गयी अत: ग्रामीणो और पुलिस वालो ने चमत्कार मान कर उस बुलेट को वही पर रख दिया। उस दिन से आज तक वहां दूसरी कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुयी जबकि पहले ये एरिया राजस्थान के बड़े दुर्घटना क्षेत्रो में से एक था।
आपकी कार खुद-ब-खुद दौडऩे लगती है
लेह-लदख में कई जगहों पर दौपहिया या चौपहिया वाहन खुद-ब-खुद दौडऩे लगते हैं। दरअसल, यहां कुछ ऐसी जगहें हैं, जहां गुरुत्वाकर्षण के नियम टूटते हुए नजर आते हैं। यहां मैग्नेटिक हिल्स के कारण गाड़ी को बंद अवस्था में रखने पर भी यह खुद-ब-खुद ढलान से ऊपर की दिशा में चलना शुरू कर देती हैं। मैग्नेटिक हिल्स को ग्रैविटी हिल्स भी कहा जाता है। यह लेह से लगभग 30 किमी की दूरी पर लेह-कारगिल-श्रीनगर नेशनल हाइवे पर है. इसकी ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 11 हजार किमी है.  इस पहाड़ी के पूर्वी हिस्से में सिंधु नदी बहती है. धीरे-धीरे यह आस-पास के क्षेत्र में रहनेवालों के बीच एक पॉपुलर टूरिस्ट स्पॉट बनता जा रहा है. इस हिल में मजेदार बात यह है कि ढलान पर कार नीचे जाने के बजाय खुद-ब-खुद ऊपर की ओर जाने लगती है। लोकल एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा हिल को मार्क करने के लिए यहां पर कई बोर्ड लगाये गये हैं।

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