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15 वां दलाईलामा स्त्री या पुरुष ?

एम4पीन्यूज। धर्मशाला

हम यहां की एंड का फिल्म की नहीं बल्कि दलाईलामा भविष्य में की होगा या का इसकी बात कर रहे हैं। अभी तक यह अनसुलझा प्रश्न ही बना हुआ है कि दलाईलामा की उत्तराधिकारी महिला होगी या पुरुष। दलाईलामा ने दोहराया है कि उनकी उत्तराधिकारी स्त्री भी हो सकती है बशर्ते वह बेहद आकर्षक हो। दलाईलामा का कहना है कि आकर्षक न होने की सूरत में स्त्री दलाईलामा ज़्यादा प्रभावशाली नहीं होगी। दलाईलामा ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में भी दलाईलामा का स्त्री होने की बात कही थी।
दलाईलामा से मिलेंगे ट्रम्प :
कांग्रेस में एक शीर्ष रिपब्लिकन सदस्य ने अमरीका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से अपील की है कि वह तिब्बतियों के आध्यात्मिक नेेता दलाई लामा से मुलाकात करें। कांग्रेस के सदस्य जिम सेनसेनब्रेन्नर ने ट्रंप को लिखे एक पत्र में कहा,‘‘जैसा कि आप राष्ट्रपति के रूप में कार्यभार संभालने की तैयारी के तहत विश्व के विभिन्न नेताओं से मुलाकात कर रहे हैं,एेसे में मैं आपको सुझाव देना चाहूंगा कि आप दलाई लामा से भी मुलाकात करें।’’

14वें दलाई लामा से नाराज चीन :
तिब्बती धर्मगुरु 14वें दलाई लामा किसी से मिलने जाएं या उनसे कोई मिलने आए इस पर चीन आग बबूला होने लगता है। जब उसे खबर मिली कि अमरीका के राष्ट्रपति ट्रम्प दलाई लामा से मुलाकात करेंगे तो उसने तुरंत एतराज जता दिया। तिब्बती धर्मगुरु जब कभी अमरीका की राजधानी में होते हैं तो राष्ट्रपति से आम तौर पर मुलाकात करते हैं। इस पर चीन कसमसाता रहता है। अमरीका ने तिब्ब्त पर चीन के जबरन कब्जे की नीति का हमेशा विरोध किया है। उसने चीन में ताईवान का एकीकरण भी स्वीकार नहीं किया।

 

चीन नियुक्त करेगा दलाईलामा ?:
चीन के मुताबिक तिब्बत की समस्या का समाधान तभी होगा जब वर्तमान दलाई लामा की मृत्यु हो जाएगी और उनकी जगह चीन की सरकार द्वारा नियुक्त कोई नया दलाई लामा आएगा। चीन का मानना है कि दलाई लामा ने तो उसी समय धर्मगुरु की अपनी हैसियत गंवा दी थी, जब वह देश छोड़कर भागे थे और लोगों के साथ विश्वासघात किया था। यदि दलाई लामा लौटना चाहते हैं, तो उन्हें तिब्बत की आजादी का राग छोड़ना पड़ेगा। सार्वजनिक तौर पर यह कबूल करना होगा कि तिब्बत व ताईवान चीन का अभिन्न हिस्सा हैं और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ही वैध हुकूमत है। चीन ने अपने सैलानियों को भी चेतावनी दी हुई है कि वे दलाई लामा से दूर रहें।

यदि पृष्ठभूमि में जाएं तो तिब्बत एक स्वतंत्र देश था। वह भारत और चीन के बीच ‘बफर स्टेट’ बना हुआ था। भारत के साथ तो तिब्बत के संबंध सदियों पुराने रहे हैं। अंग्रेजों के समय में वहां भारतीय रेल चलती थी। भारतीय डाकघर कार्यरत थे। भारतीय पुलिस थी और सेना की एक छोटी सी टुकड़ी भी देश की रक्षा के लिए तैनात थी। तिब्बत में भारतीय मुद्रा का चलन था। भूटान की तरह तिब्बत भी वैदेशिक और सुरक्षा के मामले में भारत पर निर्भर था। सब कुछ बदल गया, जब 1949 में चीन की मुख्य भूमि पर साम्यवादियों का कब्जा हो गया।

उन्होंने तिब्बत पर चढ़ाई कर दी और उसे हड़प लिया। जब तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री पंडित नेहरु ने विरोध किया तो चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाउ-एन-लाई ने उन्हें भरोसा दिलाया कि चीन-तिब्बत की राजनैतिक स्वायतत्ता और धार्मिक स्वतंत्र रखेगा। देखते ही देखते चीन ने तिब्बत के बौध्द मठों को ध्वस्त करना और दलाई लामा को हर तरह से तंग करना शुरू कर दिया।

जब दलाई लामा को सूचना मिली कि चीन की पुलिस उन्हें गिरफ्तार करके बीजिंग ले जाना चाहती है तो वे 1959 में रातों रात अपने सैकड़ों सहयोगियों के साथ भारत आ गए। भारत सरकार ने उन्हें शरण दी। चीन ने भारत से दलाई लामा को लौटाने के लिए कहा, परन्तु पंडित नेहरू इस पर राजी नहीं हुए। तब से चीन और भारत के संबंध बिगड़ते चले गए। चीन ने 1962 में भारत पर एकाएक चढ़ाई कर दी। भारत चीन की इस धोखेबाजी के लिए तैयार नहीं था। परिणाम हुआ कि वह बुरी तरह हार गया।

चीन पिछले कई वर्षों से कह रहा है कि तिब्बत हमेशा चीन का अंग रहा है। जब 1933 में 14वें दलाई लामा का चुनाव हुआ था तो वह तत्कालीन चीनी सरकार की सहमति से ही हुआ था। उस समय चीन में ‘केएमटी’ या ‘क्यू मिन तांग’ की सरकार थी। जब इस सरकार ने मंजूरी दी तभी 14वें दलाई लामा का चुनाव हुआ। भारत सहित दुनिया के सभी प्रसिध्द इतिहासकार कहते हैं कि यह सरासर झूठ है। 14वें दलाई लामा के चुनाव में चीन की कोई भूमिका और सहमति नहीं थी।

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