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एम4पीन्यूज। चंडीगढ़ 

न तन पर कपड़ा, न पैरों तले ज़मीन, न रोशनी है आसपास, हम कैसे हैं इंसान और कहां के हैं अधिकार। देश के ऐसे हज़ारों कस्बे होंगे जहां मूलभूत सुविधाओ से लड़ता इंसान, इंसानियत भूल रहा है। कोई भूख के मारे किसी का गला काट रहा है और कोई अहम के कारण किसी को जिन्दा जल रहा है। कहीं बुरखा न पहनने पर लड़की जलाई जाती है और कहीं पर ऑनर किलिंग के नाम पर प्रेमी युगलो को फांसी पर लटका दिया जाता है। क्या यही है ह्यूमन राईट डे ?

दरिंदगी की एेसी कई वीडियो यूट्यूब पर लोडिड हैं, उनमें से ये एक है

सड़क, सीवर, स्ट्रीट लाइट, सफाई, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसी सभी व्यवस्थाओं की हालत खराब है। सड़क और बाजारों की बात तो दूर घर में बैठा व्यक्ति भी सुरक्षित नहीं है। काम आने पर बुनियादी सुविधाओं की खातिर सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। इसके बाद भी समस्या का समाधान तो दूर जिम्मेदार उसकी बात सुनने को भी तैयार नहीं हैं। यह स्थिति तब है जब टैक्स के बोझ तले लोग दबे हैं। सुनियोजित सिस्टम के दावों के बीच सुविधाओं का यह हाल है तो मानव अधिकारों का तो अता पता ही नहीं है।

10 दिसंबर 1948 आज के ही दिन मानव अधिकारों की घोषणा की गई थी। बस उसके बाद से हर साल सरकारी विभाग जोरशोर से इस दिन को मानव अधिकार दिवस के रूप में मनाते हैं। सत्तारूढ़ पार्टी के नेता ऐसे अवसरों पर मानव अधिकारों की बात तो करते हैं पर उनके अमल को लेकर गंभीर नहीं है। हकीकत में जिनके लिए अधिकार बने, उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी तक नहीं है।

हम सभी को आगे आकर काम करना होगा :
मूल अधिकारों के रूप में मानव अधिकारों का प्रथम दस्तावेज सन् 1215 का इंग्लैंड का मैग्नाकार्टा माना जाता है और भारत में इसकी शुरूआत 1950 में हुई। सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई निर्णयों में इस बात पर जोर दिया है कि बेरोजगारी एवं राजस्व की हानि की अपेक्षा लोगों के जीवन,स्वास्थ्य और परिवेश का सरंक्षण कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। वर्तमान में हम सभी को दिन प्रतिदिन होने वाले मानव अधिकार हनन के लिए आगे आना होगा।

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