डेडली हैं दस, बीस और सौ रुपए के नोट
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-लक्ष्मी पूजें लेकिन इंफेक्शन से बच कर
एम4पीन्यूज, चंडीगढ़। 
रुपए जेब में भरे रहें इसकी कामना हम इंसान दिन रात करता है लेकिन इसके साथ अापको कितने खतरनाक वायरस मिलते हैं इसकी कामना करना असंभव है। डेडली हैं दस, बीस और सौ रुपए के नोट, जरा सोचिए जरी अगर आप थूक लगाकर नोट गिन रहे हैं तो आपसे पहले उस नोट को कितनों ने चाटा होगा, कितनों ने उसे अपनी सीकऱेट पॉकेट में रखा होगा और कितनों ने गंदी जेब में रखा होगा। फिर भी बड़ी बेसब्री से उतावले से होकर हम इन रुपयों को सिरमाथे लगाते हैं।
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शगुन में बच्चों के हाथ में देते हैं एेसे तमाम नोट है जिनमें एेसे बैक्टीरिया है जिससे मेडिसिन रेसिस्टेंस यानी दवाओं का असर होना खत्म हो सकता है। यानी अगर बच्चा बीमार हो गया तो उसे कोई दवा असर नहीं करेगी। ये हम नहीं पीजीआई चंडीगढ़ और दिल्ली में हुई साइंटीफिक रिसर्च कह रही है। 10 रुपए, 20 रुपए और 100 रुपए के डीएनए अध्यन्न के बाद पता चला कि रुपयों में 78 तरह के डेडली वायरस, बैक्टीरिया मौजूद रहते हैं।
इंस्टीट्यूट अॉफ जीनोमिक्स एंड इंटेग्रेटिव बॉयोलॉजी (आईजीआईबी) दिल्ली के अनुसार दो मुख्य वायरस जिनका नाम है स्टैफीलोकोकस ओरियस, एंटरोकोकस फेकेलिस। स्टैफीलोकोकस से छाले, साइनेसाइटिस, फूड पायजनिंग और एंटरोकोकस दांतों में रूट कैनाल करते पाया गया जिससे लाइफ थ्रेटनिंग बीमारियां हो सकती हैं। इन बैक्टीरिया की वजह से दवाओं की रसिस्टेंस होने से कई हेल्थ प्रॉब्लम होती हैं जिनमें से एक है एनडीएम-1 सुपरबग, जिसकी वजह से भारत में टीबी का इलाज मुशिकल हो गया है।
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पॉलीमर बैंक नोट्स हैं एकमात्र उपाय
साइंटिस्ट के मुताबिक पॉलीमर नोट्स की एकमात्र उपाय है जिससे इन इंफेक्शनों से बचा जा सकता हैं। हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है अब न्यू एज फोमाइट यानी इंफेक्शन अा गया है जो कि मोबाइल से हो रहा है। इस के इलाज पर अभी भी शोध चल रहा है।

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