वो पहला चुनाव, बैल के मुंह में पर्ची और राफेल
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क्या से क्या हो गया, चुनावी दंगल बेलिहाज़ हो गया


हमारे नानू अनपढ़ किसान थे, देश के पहले चुनाव हुए, वे भी वोट डालने गए, जब घर वालों ने पूछा : पा आया ‘कर्ते ‘ वोट ,करतार सिंह जी की मासूमियत के सदके, बोले हाँ पा आया। इक्क पर्ची दित्ती सी भाई ने, बापू ने समझाया सी, दो बैलां नूँ पाउनि आ वोट, मैं पर्ची दे दो टुकड़े कित्ते ते अपने दो बैलां दे मुँह च दे छड्डे !ऐसे चुनी गई नए भारत की लोक सभा अर्थात लोगों द्वारा चुनी गई संसद। जब लोग कुछ का कुछ समझने लगे तो हो गई शुरू ‘पैंतरेबाज़ी’।

एक वो दौर था और एक ये दौर है पैंतरेबाजी अब भी कायम है बस उसमें नीचता की मात्रा जरूरत से कहीं ज्यादा हो चली है। 

लोक तंत्र का महापर्व, उफान पर है सभी दल, लोगों के लिए उच्ची- टुच्ची खैरात बख्शने में एक दूसरे से बाज़ी मारने में व्यस्त हैं। सच तो यह है कि इंडियन वोटर को ये सब भिखारी मानते हैं एंड  ‘बैगर हैज़ नो चॉइस ‘। देश की सबसे बूढ़ी पार्टी के उम्रदराज़ युवा ने तो 25 करोड़ गरीबो को प्रति माह 12000 रूपए देने का झांसा दे डाला। 

झांसा इस लिए कि इतना बजट कहाँ से आएगा वे खुद भी नहीं जानते। वैसे गरीबी हटाने का इनका खानदानी ‘शौक ‘, पहले नेहरू जी, फिर उनकी बेटी प्रियदर्शनी इंदिरा जी, और ऐसे ही उनके पायलट पुत्र राजिव भाई रूपए में से 85 पैसे घोटालों में गँवा कर 15 पैसे में गरीबी हटाते चले गए।  फिर बूढी पार्टी की राज माता 10 वर्ष तक गरीबों की खूब मालिश करती रही और घोटालों को उंगली पर गिनना और लूट की रकम को अंकों से गिनना नामुमकिन सा हो गया।  14 लाख करोड़ के घोटाले तो ज़ाहिर हुए और ना-जाहिर अभी तक पाइप लाइन में हैं। भोली भाली जनता को हमारे चतुर सफेद टोपी धारियों ने खूब उल्लू बनाया।  चार-पांच दशक तो यूँ ही राज कर गए।

जात के नाम पर वोट, साम्प्रदाय के नाम पर वोट, धर्म के नाम पर वोट, मज़हब के नाम पर वोट। फिर शुरू हुई अल्पसंख्यकों को रिझाने ‘नूरा कुश्ती’। हमारे मौनी बाबा जी तो इसकदर तुष्टिकरण की, गहरी खाई में ‘कूद गए’ बोले देश के सभी संसाधनों पर सबसे पहला हक़ ‘मुस्लिम भाइयों का है। एक वीपी महाशय ने तो हद ही कर दी, सारे समाज को लोअर और अपर कास्ट में बाँट कर आरक्षण लागू कर दिया, बेचारे मेधावी छात्र तो सर पीटते रह गए।  मंडल को टक्कर देने कमंडल आ गया मैदान में। 

अल्प संख्यकों को अपना वोट बैंक बनाने की होड़ में खुद को सेकुलरिज़्म का आलंबर दार कहने वाले उन्हें बहुसंख्यकों का खौफ दिखा कर या फिर नए नए प्रलोभन दे कर अपना वोट बैंक मान बैठे। धीरे धीरे क्षेत्रीय दल भी इन्ही की चाल चल कर वोट लूटने लगे। आज राष्ट्र वाद का पञ्च अधिक सार्थक और असरदार है, इस की काट में सैकुलर सेना, सेना के शौर्य के भी सबूत मांगने लगी है।  कितने मारे, मारे भी की नहीं, सबूत दो, वाक् गुदमी जारी है। मुद्दे गौण हैं, जनसँख्या विस्फोट, समान नागरिक क़ानून, सभी के लिए पीने योग्य पानी, साफ़ वायु, सांस लेने के लिए हरियाली, सफाई, रोज़गार कोई नहीं पूछता। यहाँ तक की देश की सुरक्षा के लिए सेना को हथियार मुहैया न करवाने वाले ही राफेल राफेल रट रहे हैं, और अपनी दलाली पर मौन। 

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